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बखिया उधेड़ - शरद गुप्ता

बखिया उधेड़ - शरद गुप्ता

बखिया उधेड़ 


सदियों गुजरीं जंजीरों में पुश्तों ने देखा दौर तबाही का

तब शोणित को साथ मिला कुछ आंखों की तरुणाई का


जो मस्तक पर अभिमान धरे मां का अपमान कहाँ सहते

लेकिन जयचंदी बेबसी भला किसके सम्मुख, कैसे कहते


साधन थे इतने सीमित कि आवाज़ उठाना मुश्किल था

पर दंश हृदय पर गहरा था वह दंश भुलाना मुश्किल था


संकल्प लिया आजादी का अपना सर्वस्व लुटा बैठे

बेड़ियां काटने माता की वो अपने शीश चढ़ा बैठे


क्या उनके रिश्तेदार न थे, उनका परिवार नहीं था

क्या सगे सम्बन्धियों से अपने कुछ उनको प्यार नहीं था


फिर बिना वजह क्यों पचड़े में वो अपनी जान फंसाकर

कुछ फांसी पर लटक गए कुछ शांत गोलियां खाकर


वो हुए निछावर ताकि मुल्क में अमन शांति आजाए

लेकिन उसके बदले में क्या हम उनको कुछ दे पाए?


त्याग समर्पण के मुख पर कैसा उभरा यह चांटा

उन मतवालों को हमने दल और दलदल में बांटा


सत्ता के खैरख्वाह जितने थे बनते गए आसामी

और भारत के हिस्से में आई फिर से नई गुलामी


जिनका स्वप्न शिखर हिमगिरि सा हो भारत का दर्जा

वो आज चुकाते डोल रहे हैं राजनीति का कर्जा


जलियांवाला बाग कि जिसकी हवा रक्त रंजित है

कितने ही कुर्बान किंतु वो नाम कहाँ अंकित है


हमको बस नाच नचाते हैं संसद और सत्ता वाले

काश कि कोई दिलवाला उनके सपनों को पाले


आज पार्टियां चौराहों पर उनकी गाथा गाकर

फिर सत्ता में आती हैं उनका किरदार भुनाकर


बेशर्मी बढ़कर आ पहुंची अपने आज चरम तक

अपने स्वार्थ पूर्ण करने में आती नहीं शरम तक


भगत सिंह के घर की छत से कबसे पानी बहता है

लेकिन कुर्सी पाकर कुछ भी याद नहीं रहता है


शेखर जी के घर की अब हालत तक ठीक नहीं है

बिस्मिल जी के आंगन में और छत में ईंट नहीं है


पैरोकारी जिनकी फितरत ओहदा पाकर ऐंठे हैं

अशफ़ाक़ और भगवती चरण सकते में आ बैठे हैं


सरकारी दावत खा खाकर कुछने की चमड़ी मोटी

दुर्गा भाभी को थीं न मयस्सर दो सुकून की रोटी


कुछ ऐसे स्थान जहाँ पर रोज दिए जलते हैं

और शहीद, उनके बच्चे खैरातों पर पलते हैं


ऐसा ही आलम भारत में हर दिन हर रोज रहा है

खुदीराम का नाम आज अपनापन खोज रहा है


चलो तुम्हारी खुशी, सहेजो तुमको जो प्यारे हैं

पर मत भूलो लाल वो भारत माता के सारे हैं


जिससे तुमको लाभ मिले तुम उन्हें भले ही पालो

लेकिन शेष शहीदों पर यूं कीचड़ तो न उछालो


अगर शहीदों की


मेरा विरोध बस इतना ही, इतिवृत में जो चाहे भरदो

पर भूले से ना शेखर सुभाष को, दफन हाशिये में कर दो